उत्कर्ष :: हिंदी की समकालीन युवा कविता : राष्ट्रीय गोष्ठी

10/31/2011
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29 अक्टूबर 2011 को सत्यवती कालेज में आयोजित हिन्दी की समकालीन युवा कविता विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रोफ़ेसर कर्ण सिंह चौहान ने कहा कि इतनी सारी और इतनी अच्छी कविताओं को सुनने के बाद उन पर टिप्पणी करना कविता को सामान्यीकृत करना है और कविता कोई सामान्यीकृत करने वाली चीज नहीं है, एक ज़माना था जब चीजें बहुत स्पष्ट थीं। आज चीजें उतनी स्पष्ट नहीं हैं। यही बात आलोचना के क्षेत्र में भी लागू होती है। उन्होंने कहा कि आलोचना के पुराने प्रतिमानों बात नहीं बनेगी। ब हमें नए प्रतिमान बनाने पड़ेंगे तब तक बात अधूरी ही रहेगी।

इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों के 20 युवा कवियों और दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कालेजों के 150 प्राध्यापकों और विद्यार्थियों नने हिस्सा लिया। कई मायनों में यह एक अलग तरह का और बेहद महत्वपूर्ण आयोजन था। इस महोत्सव में युवा कवियों ने कविता लेखन के अपने अनुभव, अपनी रचना प्रक्रिया और वर्तमान समय में कविता की भूमिका और उसकी चुनौतियों पर बात की ।

कार्यक्रम के उदघाटन वक्तव्य में कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कालेज के प्राचार्य डा देवेन्द्र प्रकाश ने कहा कि नई और अपनी ही तरह कदमियां करना सत्यवती कालेज की रिवायत है और कालेज की कला और सस्कृति परिषद-उत्कर्ष द्वारा हिन्दी की युवा कविता पर ये राष्ट्रीय संगोष्ठी एक ऐसा ही कदम है। उत्कर्ष के संयोजक डा0 मुकेश मानस ने कहा कि आज के समय में कला के कुछ रुप बेहद सकट में हैं जिनमें कविता एक है। कविता को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इसमें भी युवा कवियों को चिन्हित करना और उन्हें प्रोत्साहित करना एक बड़ा काम है । हमारा यह कार्यक्रम इसी दिशा में एक कदम है। इसके बाद उत्कर्ष के बैंड राईज़िग फ़ायर ने गोरख पांडे, रघुवीर सहाय और कुंवर नारायण की कविताओं की बेहद प्रभावपूर्ण गायन प्रस्तुति की। प्रथम सत्र में भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित युवा कवि अनुज लुगुन ने कहा मेरी कविता मेरे परिवेश से जुड़ी है। एक व्यक्ति के रूप में मेरी निर्मिति जिस तरह होती है उसी तरह से मेरी कविता की होती है। इसके बाद अरुण देव, अमित कुमार, संध्या नवोदिता, मुकुल सरल, ओमलता, मजरी श्रीवास्तव, आदि ने आपने काव्यलेखन के अनुभवपर अपनी बात रखी और अपनी कविताओं का पाठ किया।

दुसरे सत्र में चर्चित कवि श्री मिथिलेश श्रीवास्तव को उत्कर्ष की तरफ़ से प्रोफ़ेसर कर्ण सिंह चौहान ने प्रथम कविता मित्र सम्मान दिया और वरिष्ठ कवि शिवमंगल सिद्धांतकर ने शाल ओढ़ा कर मिथिलेशजी का सम्मान किया। युवा अभिनेता, नाटककार और निर्देशक विजय सिंह ने मुक्तिबोध की तीन कविताओं का नाटकीय वाचन किया। दूसरे सत्र में अशोक पांडे, गिरिराज किराड़ू, रजनी अनुरागी, पूनम तुषामड़, रमेश बर्णवाल, रेणु हुसैन, सईद अयूब कवियों ने अपना वक्तव्य रखा और अपनी कवितायें पढ़ीं।

कार्यक्रम का संचालन डा0 राजेश चौहान और डा0 विदित अहलावत ने किया। कार्यक्रम में कई अखबारों के पत्रकार मौजूद थे जिनमें हिन्द केसरी के कार्यकारी संपादक डा0 अनिल सोलंकी और दैनिक भास्कर से स्वतंत्र मिश्र प्रमुख हैं।
:: मुकेश मानस 
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जिज्ञासा और प्रतिलिपि का आयोजन

10/09/2011
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विपिन चौधरी


जिज्ञासा मंच और प्रतिलिपि बुक्स का सयुंक्त प्रयास.अपने प्रिय लेखकों  से रूबरू सवालात और जबाब. अपने आप मे एक महत्वपूर्ण घटना है.लेखकों की रचना प्रक्रिया को जानना एक अलग तरह का अनुभव देता है, और यह अनुभव बखूबी प्रदान किया "जिज्ञासा मंच और प्रतिलिपि प्रकाशन" ने. देश की राजधानी में तमाम तरह के साहित्यिक आयोजन होते रहते  हैं. कुछ आयोजन अपनी समाप्ति के साथ ही जहन से विलुप्त हो जाते है,परन्तु ७ अक्टूबर २०११  को संपन्न हुए  जिज्ञासा और प्रतिलिपि के सयुंक्त प्रयास से आयोजित यह कार्यक्रम लम्बे समय तक याद करने वाला है. इस कार्यक्रम में प्रतिलिपि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों प्रभात रंजन की बोलेरो क्लास, मनोज रूपड़ा की टावर ऑफ़ साईलेंस और मार्केज़ के जीवन और लेखन पर आधारित प्रभात रंजन द्वारा लिखित पुस्तक मार्केज़ की कहानी पर चर्चा हुई.

कार्यक्रम का संचालन प्रतिलिपि प्रकाशन के गिरिराज किराडू ने किया.कार्यक्रम की शुरुआत में जिज्ञासा मंच की गतिविधियों के बारे में प्रकाश डालते हुए सुमन केसरी अग्रवाल ने बताया कि ...कुछ अरसे पहले मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास "शिगाफ" पर जिज्ञासा ने गोष्ठी आयोजित करवाई थी और आज की इस गोष्ठी  में कुछ उपेक्षाकृत युवा और नए लोगों को इन साहित्यिक पुस्तकों पर चर्चा करने का मौका दिया जा रहा है..

आज के आलोचकों की दिक्कतों और उपनिवेशवाद की स्मृतियों पर बोलते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रसिद्ध आलोचक विचारक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा "कोई भी कृति पहले लोकल होती है,और फिर ग्लोबल. आज की आलोचना में मूल पाठ छोड़ कर सब कुछ होता है बस मूल पाठ का ही जिक्र नहीं होता .रेनू का उपन्यास ग्लोबल नहीं था.  जादुई यथार्थवाद हमारे आज के समाज और अपने घर मे ही देखने को मिल जाता है. . उन्होने इस बात पर चिंता व्यक्त  करते हुए कहा की दिक्कत इस बात की है कि समकालीन लेखन ने औपनिवेशिक स्मृतियाँ मिटा दी हैं और हमारे यहाँ के लेखक को कालिदास भी तभी याद आते है जब उन का जिक्र कोई विदेशी करता है.. ब्रिटिश भारत में अकाल जानबूझकर पैदा किया गया जिससे कि अंग्रेजों को  सस्ते लेबर मिल जाएँ ..और विचित्र यह है कि इस क्रूरता और इस तरह कि हिंसा की याद भी मिटती जा रही है. हम इस तरह रहते हैं जैसे कभी यह  देश  उपनिवेश रहा ही न हो. 

युवा कवि अरुण देव ने प्रख्यात स्पेनिश लेखक "मार्केज़" के जीवन और लेखन पर आधारित कथाकार प्रभात रंजन द्वारा लिखित पुस्तक मार्केज़ की कहानी पर चर्चा करते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण किताब है जिसमें प्रभात ने उनके जीवन में आई औरतों पर  एक अध्याय ही लिखा है.अपने वक्तव्य मे उन्होंने एक मार्के की बात कही कि यह सोचने की बात है की एक महान पत्रकार होते हुये भी मार्केज ने अपने लेखन में भारत  का कही कोई जिक्र नहीं किया, जबकि उनकी रचनाशीलता  और  भारत के आजादी का  संघर्ष एक ही समय में घटित हो रहे थे. और वह जबकि एक पत्रकार भी थे.

अरुण देव ने जादुई यथार्थवाद के मसीहा मार्केज़ के जीवन के तिलिस्म पर बोलते हुए कहा कि हमारे लिये मार्केज़ के लेखन के अलावा यह भी जादुई यथार्थ है कि कैसे एक लेखक अपने जीते जी किवदंती बन जाता है और उसका जन्मदिन एक उत्सव की तरह मनाया जाता है और हिंदी के लिए यह भी चकित करने वाली चीज है कि एक लेखक ६ देशों में अलग अलग बंगले रखता हो.

युवा कवयित्री  विपिन चौधरी ने प्रभात रंजन के कहानी संग्रह "बोलेरो क्लास"पर बोलते हुए कहा कि इस संग्रह की कहानियों में आज के इन्सान के धैर्य चुकने का अंतर्नाद ,है जो देर तक प्रतिध्वनित होता रहता है और यही  गूँज इस संग्रह की सफलता है.

इसके अतिरिक्त राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय ने अनुवाद की तकनीक और उसकी उपयोगिता पर सारगर्भित वक्तव्य दिया और विनयकान्त मिश्र ने मनोज रुपङा की कहानी संग्रह "टावर ऑफ़ साईलैंस" की तीन लंबी कहानियों पर अपनी रोचक टिप्पणियाँ दी.

गौरतलब यह है की प्रतिलिपि का सरोकार देश विदेश के साहित्य को उस ऊंचाई  पर ले जाने का है जो आज के हिंदी संस्थानों की स्वार्थता के कारण अब तक नहीं पहुँच पाया है. युवा लेखकों और प्रतिलिपि प्रकाशन जैसे संस्थानों के सयुंक्त प्रयास से यह संभव हो सकता है.

कार्यक्रम के अन्त में प्रभात रंजन और मनोज रूपड़ा से श्रोताओं ने उनकी रचनाशीलता पर दिलचस्प सवाल किए. जिनके जबाब भी कम दिलचस्प नहीं थे.. गोष्ठी में मनीषा कुलश्रेष्ठ, सैयद अयूब और बड़ी संख्या में सुधी श्रोताओं की उपस्थिति रही. 

























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