संगोष्ठी : ‘आलोचना की चुनौतियाँ

9/26/2012

 आज के दौर में लोकतंत्र की चुनौती ही आलोचना की चुनौती है :  प्रो. राजेंद्र कुमार
(प्रो. मैनेजर पांडेय के 71 वर्ष के होने पर ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन)

वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय के जीवन के 71 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 23 सितम्बर को जन संस्कृति मंच की ओर से इलाहाबाद में ‘आलोचना की चुनौतियाँ’ विषय पर प्रो. राजेंद्र कुमार की अध्यक्षता में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. अपने सम्बोधन में प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि आज के समय में जो चुनौतियाँ लोकतंत्र के समक्ष हैं, वही आलोचना की भी चुनौतियाँ हैं. उन्होंने बताया कि साहित्य में आलोचना विधा का आगमन गद्य के उद्भव के साथ होता है. पश्चिम में यह पूँजीवादी लोकतंत्र के साथ जन्म लेती है. आज भारत में यह लोकतंत्र भी चुनौतियों का सामना कर रहा है. इसका संकट और इसकी चुनौती आज की आलोचना की भी चुनौती है. उन्होंने कहा कि आज की आलोचना को एक समझ और तमीज विकसित करनी चाहिए जो यह पहचान सके कि साहित्य में विचारधारा को गैर-जरूरी बताने वाले खुद किस विचारधारा को स्वीकार्य बनाना चाहते हैं. उत्तर आधुनिकता, जो ‘सब-कुछ’ को ‘पाठ’ बनाती है, वह अपने आप में खुद एक विचार का आरोपण है. उन्होंने आगे कहा कि प्रतिरोध की चेतना की पहचान ही आलोचना को महत्वपूर्ण बनाती है. आलोचना का काम रचनाकार को छोटा या बड़ा सिद्ध करना नहीं है.

इस अवसर पर इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि आज आलोचना की चुनौती यह है कि साहित्य को साहित्य, और समाज को समाज बनाए रखने में मदद करे क्योंकि आज पूँजीवाद इसी को खत्म कर देना चाहता है. उन्होंने कहा कि आलोचना के लिए जन-सरोकार होना जरूरी है. आलोचना एक उपकरण भी है, जिसे चलाना मालूम होना चाहिए. आज आलोचना को साहित्य के लिए मशाल होना चाहिए. वह साहित्य और जन के बीच पुल है. आलोचक और कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि विचारधारा और साहित्य-रचना का जो तनाव है वह आलोचना में होना चाहिए, उसे नज़र-अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. सामाजिक शक्तियों के जो संघर्ष हैं, साहित्य उन्हें प्रतिबिम्बित करे. रविभूषण (राँची) ने कहा कि आलोचना जीवन और समय-समाज सापेक्ष होनी चाहिए. आज के संकट के समय में आलोचना को राजनीतिक प्रश्नों से भी जूझना होगा.

आलोचक गोपाल प्रधान (दिल्ली) ने आलोचना के वर्तमान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज क्षणिक किस्म के परिवर्तनों का उत्सवीकरण हो रहा है और आलोचना के भीतर से इतिहास बोध को विलोपित किया जा रहा है. जब कि हिंदी आलोचना अपने प्रारम्भ से ही सिर्फ साहित्य-आलोचना नहीं रही बल्कि उसने व्यापक सामाजिक सरोकार रखते हुए समाज और देश की आलोचना की. इतिहासबोध उसमें एक जरूरी तत्व रहा है. उन्होंने कहा कि देश का शासक-वर्ग इतना देशद्रोही शायद ही कभी रहा हो, जितना कि आज का शासक-वर्ग है. उसके भीतर के भय का आलम यह है कि वह कार्टून भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है. उन्होंने अत्याधुनिक तकनीकी के साथ अत्यंत पिछड़ी हुई सामाजिक चेतना के मेलजोल के खिलाफ आलोचनात्मक संघर्ष चलाने की आवश्यकता बताई. पंकज चतुर्वेदी (कानपुर) का कहना था कि आलोचना अगर रचना में मुग्ध हो जाएगी तो वह रचना को ठीक से देख नहीं पाएगी. आलोचक को रचना की संशक्ति के साथ उससे दूरी भी बनाए रखनी होगी तभी वह रचना के महत्व को रेखांकित कर पाएगी. तमाम आलोचक दूरी बनाते हैं लेकिन संशक्ति गायब है. आलोचना को रचना से, उसके रचना कर्म से संबोधित होना होगा. आज के आलोचक पारिभाषिक शब्दावलियों के गुलाम हैं. पूरी आलोचना इन्हीं बीस-पच्चीस शब्दों से काम चलाती है. पारिभाषिक शब्दों की यह गुलामी रचना और आलोचना के बीच एक परदे का काम करती है. आलोचना को नए शब्द ईजाद करने होंगे. उन्होंने रचना और आलोचना में विचारधारा की आबद्धता को गैर ज़रुरी  बताते हुए कहा कि जनता के प्रति सम्बद्धता जरूरी है लेकिन विचारधारा से आबद्धता जरूरी नहीं.

प्रो. चंद्रा सदायत (दिल्ली) ने कहा कि आज के दौर के अस्मितावादी विमर्श आलोचना का ही हिस्सा हैं. इसे और व्यापक बनाने के लिए अन्य भाषाओं के (अस्मितावादी विमर्शों के) अनुवाद को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए या फिर आलोचना को कम से कम उनका संदर्भ तो लेना ही चाहिए. प्रज्ञा पाठक (मेरठ) ने कहा कि स्त्री के जीवन और साहित्य को अलग कर के देखने से उसके साहित्य का सही मूल्यांकन नहीं हो पाएगा. तमाम लेखिकाएँ भी इसमें भ्रमित होती हैं. आलोचना में अभी भी स्त्री-रचना पर बात करने में पुरुषवादी सोच का दबाव काम करता है. स्त्रियाँ भी स्त्री-विमर्श या रचना पर बात करते समय इसी प्रभाव को ग्रहण कर लेती हैं. स्वतंत्र और व्यक्तित्ववान स्त्री आज भी आलोचना के लिए चुनौती है.   

अपने जन्मदिन के मौके पर, संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो‌. मैनेजर पांडेय ने कहा कि विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है. आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग ईमानदारी से होना चाहिए क्योंकि पारिभाषिक शब्द विचार की लम्बी प्रक्रिया से उपजते हैं. उन्होंने कहा कि साहित्य की सामाजिकता की खोज और सार्थकता की पहचान करना ही आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती है.    
                 
इस अवसर पर राहुल सिंह (बिहार), रामाज्ञा राय (बनारस) आदि वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे. संगोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया. इससे पहले कॉ. जिया उल हक ने प्रो. मैनेजर पांडेय को उनके जन्म दिन के उपलक्ष्य में शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया. इस मौके पर प्रो. मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर केंद्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ. इनमें से पहली पुस्तक मैनेजर पांडेय का आलोचनात्मक संघर्ष युवा आलोचक तथा जसम के महासचिव प्रणय कृष्ण द्वारा लिखित तथा जसम के सांस्कृतिक संकुल द्वारा प्रकाशित है जिसका मूल्य सौ रुपए है. दूसरी पुस्तक आलोचना की चुनौतियाँ का सम्पादन दीपक त्यागी द्वारा किया गया है.  
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प्रेमशंकर 
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राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान में कविता

9/21/2012


राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान :: एक दस्तक, एक खोज


दिनांक १५ सितम्बर 

ग्लोब पर कौन-कहाँ लीक से हटकर कुछ नया कर जाएगा..ऐसी राह छोड़ेगा कि उस पर चलकर हर बार विस्मय से आपके होंठ दबे होंगे, कहा नहीं जा सकता. हाँ, यदि यह दस्तक आप समय पर नहीं सुन पाते तो यह व्यर्थ हो जाती है; ठीक उसी तरह जैसे एक पाइप जो पानी को दूर तक ले जाता है,प्यासे खेतों को महका देता है; यदि उसमें कई छेद हो जाएँ,तो भारी ऊर्जा का संवाहक,जीवन का यह संवाहक- बेकार सिद्ध होगा. तो हमें इस नवाचार को पहचानना है..इसमें छिपी प्रयोगधर्मिता का स्वागत करना है.



यहाँ अहमदाबाद में रहते सत्रह वर्ष हुए.. पर इस दस्तक को कैसे नहीं सुन सकी जो बिलकुल कुछ ही फासले पर बराबर आहट दे रही थी..बल्कि अपने होने को बताती सुलग रही थी..ऐसे,जैसे एक मशाल किसी पुराने अँधेरे में हस्तक्षेप करती है और इसी पुराने से कितने ही चरागान-ए-गुल खिलते हैं. 





१५  सितम्बर,  की सुबह  अमहदाबाद आये अपने अतिथि कवियों -सुमन केशरी, अरुण देव, महेश वर्मा, और सईद अयूब के साथ शहर के शोर में  अपनी अलग पहचान बनाते राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान में आयोजित एक काव्य-पाठ में शिरकत करने का अवसर मिला. सुमन केशरी जी और विपिन जी के कारण यह संभव हो सका था. यह एक नया अनुभव था, कुछ इसलिए भी अलग था क्योंकि एक तो हम सब अपनी नयी पीढ़ी के सामने थे, और नयी पीढ़ी भी वह जो हनी-बी दर्शन पर नए तरह का काम कर रही है..और दूसरे हम सभी चाहे वह लेखक हो,अकादमिक इकाई हो,शोधार्थी हो, किसान या दस्तकार हो, नीति-निर्धारक उद्यमी या प्रवर्तक हो.. एक ही तरह की सर्जना से संचालित हैं, जो अदृश्य रूप से मधुमक्खी संजाल के तर्क और संवाद दर्शन से अनुप्राणित है...और जहाँ निरंतर नए की खोज ज़ारी है और विचारों को जगह मिलने की पूरी संभावनाएं हैं एवं  पुराने का पुनर्स्थापन नूतन सन्दर्भों में हो रहा  है. 


इस तरह हम सब एक गोल्डन ट्राईएंगल के बीच थे जिसका एक कोण नवप्रवर्तन है, दूसरा कोण इसी का विस्तार 'उद्यम' है और जो एक ख़ास तरह के कोण निवेश के साथ अपनी ख़ास पहचान बनाता है. NIF (राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान) Grassroots innovations Augmentation Networks के तहत कार्य करती है जिसका उद्देश्य जनसाधारण से मूलभूत रूप में उस प्रतिभा को खोज निकालना है जो तकनीक एवं व्यावसायिक उत्कृष्टता का परिचायक ही न हो बल्कि देश की उन्नति में सक्रीय रूप से अपना योगदान दे सके. इस हेतु राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान हनी बी दर्शन पर अपना कार्य कर रहा है. इसके संस्थापक अहमदाबाद में प्रोफ़ेसर अनिल कुमार गुप्ता (भारतीय प्रबंध संस्थान) हैं और ३८ वर्षीय विपिन इसके प्रबंधक.



१५ सितम्बर की सुबह NIF के प्रांगण में पुष्पगुच्छ से अतिथि कवियों का स्वागत करते हुए. काव्य पाठ आरम्भ हुआ. अरुण देव और महेश वर्मा ने कविताओं के पूर्व बीज वक्तव्य दिया, जो संस्थान के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी रहा. सुमन केशरी जी की कविताएँ उद्वेलित करने वाली थीं. सईद ने अपनी एक नज़्म पढ़ी जिसकी सभी ने सराहना की. वहीँ के एक विद्यार्थी राहुल ने पूरे जोश से कुछ कविताएँ पढ़ीं..उनकी ताजगी निश्चित रूप से वसंत के आगमन जैसी लग रही थी. 


काव्य-पाठ के साथ संस्थान को करीब से जानने का सुअवसर मिला. यह संस्थान प्रयोगधर्मी अन्वेषक तथा पारंपरिक ज्ञान संपन्न लोगों की आवाज़ है जिसका मिशन सीखना, सृजन करना, तलाशना और सद्भाव के साथ दूसरों में बांटना है.

हनी बी नेटवर्क गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी निर्मात्री श्रृंखला है जो भारत में अहमदाबाद, जयपुर , मदुरई (तमिलनाडु),

तुमकुर (कर्नाटक), और जम्मू-कश्मीर में सक्रीय है. लेखक वर्ग भी इस संजाल से जुड़े, इस शुभकामना के साथ ..













अपर्णा मनोज 
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खुले में रचना : ५ :

9/18/2012

खुले में रचना और काव्य पाठ


दिनांक १३ और १४ सितम्बर, अहिन्दी प्रदेश गुजरात की काली मिट्टी हिंदी कवियों के आगमन से महक उठी. अहमदाबाद के आकाश पर छाये काले बादल कविता में डूब मदिर-मदिर बरसते रहे और यहाँ के वातावरण में सब कुछ काव्यमय हो उठा. यह आयोजन इसलिए भी अद्भुत था कि यहाँ कविता और तकनीकि का समागम हो रहा था.

दिनाँक १३. ९..२०१२ की संध्या पर आयोजित कार्यक्रम खुले में रचना- ५ का सफल संचालन युवा एवं प्रतिभाशाली कवि श्री सईद अयूब ने किया, ओ.एन.जी.सी. आगार अध्ययन संस्थानअहमदाबाद, का सेमीनार हॉल जिसका साक्षी रहा.

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि, पत्रकार, कथाकार, व्यंग्यकार श्री विष्णु नागर जी ने की, जिन्हें हिंदी साहित्य में अपने खास तरह के मुहावरे के लिए जाना जाता हैं.कार्यक्रम का शुभारंभ सांय ४ बजे स्थानीय एवं संवेदनशील कवयित्री अपर्णा मनोज ने अपनी रचना "स्त्री" से किया, जो स्त्री अस्मिता पर प्रश्न भी उठाती है और पुरुषों की दबंगई पर प्रहार भी करती है. "लौटना" आदिवासी स्त्रियों की जीवनशैली में गुंथी दिखाई देती है , तो "मृत्यु" मृत्यु से  आग्रह करती है एक बार स्त्री हो जाने का.... आयु के हर पन  के साथ बदलता जाता है गाँव "लहेजी".

इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए हरिद्वार से आये श्री समीर वरण नंदी जी ने "अजगर " को  '' के नज़दीक बैठे देखा, तो "कछुआ" दूसरों से बचने के लिए स्वयं को घायल करते दिखा.उनकी कविता में "खेल" श्रेष्ठतम खिलाड़ियों के साथ स्थान पाते हैं, तो  बोरे में बंद "पांडुलिपियाँ" उन्हें बचपन में लौटा ले जाती हैं. पलभर के लिए मुझे लगा कि मैं भी खरगोश की तरह बचपन के इस अरण्य में दौड़ती फिर रही हूँ. स्मृतियों की एक पाण्डुलिपि जैसे शनैः शनैः खुल रही थी.

कार्यक्रम में स्त्रियों की उपस्थिति का आधिक्य देखते हुए  श्री विष्णु नागर जी ने स्त्री एवं प्रेम विषयक कविताओं से लोगो का ध्यान खींचा. नदी की भांति निश्छल और निर्बाध गति से बहती हैं उनकी कविताएँ, जिनमे तैरते हुए शब्द-चित्रों को सहजता से देखा जा सकता है, चाहे वह "छोरे- छोरियां" हो या "हौ ". प्रेमाभिव्यक्ति की पुनरावृत्ति का गरिमामयी समर्थन करती "शादी के तेईस साल बाद" एक अलग जीवन्तता बिखेरती है."मालिक चाय तैयार है" स्त्री के स्वाभिमान की अनकही कथा कहते दिखाई देती है. निसंदेह नागर जी की सभी कविताएँ सराहनीय थीं.

कविता संबंधी प्रश्नों पर चर्चा करते हुए उप महाप्रबंधक एवं राजभाषा अधिकारी आगार अध्ययन संस्थान ओ.एन.जी.सी. श्री एस.वेलचामी ने कहा कि गुजरात राज्य में "खुले में रचना" कविता से सम्बंधित चर्चा का पहला कार्यक्रम है, इसकी मैं सराहना करता हूँ और इस नई सोच का स्वागत करता हूँ. कार्यक्रम के संयोजक श्री सईद अयूब को धन्यवाद देता हूँ.

hsdामें रचना- ५"जित कार्यक्रम "साहित्य और तकनीक को लेकर चर्चा में अपने विचार व्यक्त करते हुए अरुण देव ने कहा कि कविता का भविष्य संभावानाओं से  भरा हुआ है, तकनीकि ने कविता के क्षेत्र को विस्तार दिया है. समीर जी ने कहा कविता संस्कारों में  घुली होती है, घर, परिवार मुहल्लों से होती हुई विस्तृत हो जाती है.   समीर जी की कहन को सार्थक करती कविता की दहलीज़ पर दृढ़ता से पाँव रखने वाली वल्लरी नवयुवकों से कविता के पास जाने की बात पर ज़ोर देती दिखी.

अहमदाबाद में अपनी तरह का ऐसा पहला कार्यक्रम था  "खुले में रचना" जिसे भरपूर सराहना मिली.  कार्यक्रम में बाहर से आये अरुण देव, लीना मल्होत्रा राव, महेश वर्मा के अतिरिक्त  डॉ० प्रभा मजुमदार, डॉ० अंजना संधीर, डॉ. द्वारका प्रसाद सांचीहर, श्री परिहार जी, श्री मुकेश श्रीवास्तवसुश्री वल्लरी एवं संघमित्रा आदि स्थानीय साहित्य प्रेमियों ने इस चर्चा में भाग लेकर कार्यक्रम को सफल बनाया.
विष्णु नागर जी की एक छोटी सी कविता के साथ इस सत्र को विश्राम देती हूँ-----
                                                                       


तुम्हें हँसते देख 
मन में एक दुष्ट ख़याल आया
तुम रोते हुए , कैसी लगोगी 
तुम फिर भी   
हँसती रहीं.

अगले दिन की काव्य संध्या ओ.एन.जी.सी. के आगारप्रेक्षागृह में संपन्न हुई. हिंदी समिति के उपाध्यक्ष श्री टी आर मिश्रा जी ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ दीं और संस्थान प्रमुख श्री आर के शर्मा ने मुख्य अतिथि श्री नागर जी को पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया. वरिष्ठ ओ.एन.जी.सी. अधिकारियों एवं श्री विष्णु नागर जी के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ. श्री नागर जी  ने अध्यक्षीय भाषण में हिन्दी के विकास में मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मीडिया से हिंदी का विस्तार तो हुआ है किन्तु विकृतियाँ भी आयी हैं. हिन्दी में अंगरेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग सहजता से किया जा रहा है किन्तु दूसरी भाषाओं के शब्दों का समावेश कम हुआ है, इसे बढ़ावा मिलना चाहिए, ताकि हिन्दी को और समृद्ध किया जा सके.

तदुपरांत  मुद्रा कला केंद्र अहमदाबाद के कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक आयोजन हुआ. गुजरात साहित्य अकादमी के महा-मात्र श्री हर्षद त्रिवेदी का कार्यक्रम में आगमन बाहर से आये कवि- कवयित्रियों के लिए प्रेरणादायी रहा.

जहाँ एक तरफ लीना मेहरोत्रा राव की कवितायेँ बनारस में पिंड दान",“जात के जूते" और मैं बची रहूंगी प्रेम में" श्रोताओं को विगलित कर गईं, वहीँ सशक्त हस्ताक्षर की तरह प्रभा मजुमदार की "अपने हस्तिनापुरों में" और "संवाद" कविताओं ने वैचारिक हस्तक्षेप किया. छत्तीसगढ़ से आये युवा कवि महेश वर्मा की कविताओं में जीवन का रसायन पारे की तरह अनुकूल जगह बनाता हुआ असीम प्रार्थनाओं का ज्योतिपुंज है, जिसमें जिजीविषा का स्वर मुखर होता है. स्थानीय कवियत्री प्रतिभा पुरोहित ने कविताओं के माध्यम  से अपनी प्रतिभा का परिचय दिया.

अपर्णा मनोज की कविताएँ संवेदनाओं के द्वार की सांकल हैं जो खुलते ही "पुराने शीशे" और "स्त्री" की बुनावट में आकार लेने लगती हैं. छोटी-छोटी चीजों को एक विशेष दृष्टि से देखने की क्षमता रखने वाले, अरुण देव ने  एक अच्छी बात कही, जिसे मैं उद्धृत करना ज़रूरी समझती हूँ. उन्होंने ओ.एन.जी.सी. अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि कवि हृदय से कविता निकालता है और आप सब जमीन से.   

अरुण देव की लालटेन”, “बेरोजगार पिता”,“नई शुरुआत”, एवं सीख आदि कविताओं ने सभा को स्तब्ध कर दिया. धीरे-धीरे मन में उतरती यह कविताएँ देर तक अपना असर बनाये रहीं. प्रेम कविता "काश" ने वातावरण को प्रेममय बना दिया. कार्यक्रम का संचालन कर रहे सईद अयूब ने अरुण देव के कवितापाठ से बने माहौल का लाभ उठाने की बात कहते हुए कुछ शेर और तुम मेरे लिए हो” कविता से सभी का दिल जीता. श्री टी आर मिश्रा जी ने ग्राम्य पृष्ठ भूमि से प्रेरित कविता का पाठ किया. उनकी परंपरागत सीख देती कविता रहो चार कदम दूरने सभी का भरपूर मनोरंजन किया.  

प्रसिद्ध कवयित्री और कथाकार सुमन केशरी जी मिथकों को आधुनिकता के उस भूखंड पर लाकर खड़ा कर देती हैं, जहां भावों की मखमली दूब बिछी है.."सूरज की ऐन नाक के नीचे, उसने अपना घर बना ही लिया,एक औरत के होने, उसकी अस्मिता का उद्घोष हैं सुमन जी की कविताएँ. सुमन जी की  कविताएँ श्रोताओं द्वारा खूब पसन्द की गईं.

श्री समीर वरण नंदी ने बिना लाग लपेट के कविताओं के माध्यम से श्रोताओं से सीधा संवाद करते हुए सरकारी तंत्र पर प्रहार किया. "आरुशी" जैसी संवेदनशील कविता ने श्रोताओं के मर्म को छू लिया. वहीँ "लोभी" ने समाज में हो रहे अनाचार की ओर ध्यान दिलाते हुए सुधार की संभावनाओं पर बल दिया.   

विष्णु नागर जी की रचनाएँ “सिस्टम”, “गधाआदि ने श्रोताओं को सम्मोहित कर लिया. उनकी कविताओं का मुहावरा जितना नया है उतना ही जन-जीवन के समीप भी, इसलिए छोटे-छोटे विषय भी उनकी कविताओं में पूर्ण सम्प्रेषण के साथ कभी व्यंजना में तो कभी अभिधा में अपनी बात कहते हैं.

कार्यक्रम के अंत में उप महा प्रबंधक (मां.सं.) एवं राजभाषा अधिकारी श्री एस. वेलचामी, आगार अध्ययन संस्थान, ओ एन जी सी, अहमदाबाद  ने कार्यक्रम की अनापेक्षित सफलता के लिए सभी का आभार व्यक्त किया. उनकी मीठी हिन्दी ने सभी अतिथियों का मन मोह लिया.

संचालक सईद अय्यूब और ओ.एन.जी.सी. के मुख्य भौमिकी अधिकारी श्री मुकेश श्रीवास्तव के प्रयासों से अहमदाबाद में ओ.एन.जी.सी. के तत्त्वावधान में दिनांक १३ सितम्बर और दिनांक १४ सितम्बर को क्रमश: सेमीनार एवं काव्य-पाठ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ. दोनों कार्यक्रम सईद अय्यूब और   अपर्णा मनोज के अथक प्रयासों से ही संभव हुए. बड़े ही अपनापन और लगाव से अपर्णा ने कवि मित्रों की देखरेख की. घर की जिम्मेदारिओं के साथ इस बड़े आयोजन का बीड़ा उठाना और उसे सफलतापूर्वक सम्म्पन करा ले जाने की उनकी क्षमता काबिले तारीफ है. इसके साथ ही एन. डी. पाण्डेय का आत्मीय सहयोग रहा.

अरुण जी की कविता "लालटेन की कुछ पंक्तियों के साथ शुभकामनाएँ.






अभी भी वह बची है
इसी धरती पर 

अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे धीरे

सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी

कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा.











ज्योत्स्ना पाण्डेय

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