हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह

11/26/2012

अरे यायावर रहेगा याद
हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' के लोकार्पण समारोह की एक रपट वाया नई दिल्ली

    

दिल्ली में जबकि मौसम सर्द होने लगा है, कुछ लोग अस्तर लगे हुए कोट पहनने लगे हैं और कुछ लोगों ने अस्त्राखान की बनी हुयी कश्मीरी टोपियाँ निकाल ली हैं या उन्हें कश्मीर से मंगवाने के बारे में विचार करने लगे हैं, यह जानकर आश्चर्यमिश्रित सुखद अहसास हुआ कि कोट के अस्तर और अस्त्राखानी टोपियों का सम्बन्ध रूस में वोल्गा के किनारे बसे हुए उस शहर के नाम से है जिसे अस्त्राखान के नाम से जाना जाता है और जहाँ कई सदी पूर्व भारत से हिंदू व्यापारी पहुँचे थे. और भी कई रोचक, ज्ञानवर्धक बातों का पता चला किंतु इन बातों के पता चलने के अलावा भी वहाँ बहुत कुछ था. वहाँ जबकि बाहर का मौसम ठंडा होने लगा था, एक ऊष्मा, ऊर्जा, ओज और आनंद से भरा हुआ माहौल था. आम तौर पर जबकि पुस्तकों का लोकार्पण समारोह एक रस्म बन कर रह जाता है और आने वाले लोगों की अधिक रूचि कार्यक्रम के जल्दी समाप्त होने में रहती है, प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की नयी कृति यात्रा-संस्मरण ‘हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह एक अत्यंत ही सफल साहित्यिक आयोजन सिद्ध हुआ.
दिनाँक 25 नवंबर 2012, दिन रविवार को शाम 5:30 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' का लोकार्पण समारोह आरंभ हुआ. पुस्तक का लोकार्पण डॉ. कर्ण सिंह के हाथों सम्पन्न हुआ जबकि मुख्य वक्ता के रूप में देवीप्रसाद त्रिपाठी, ओम थानवी और सुश्री मन्नू मित्तल जी ने अपने वक्तव्य दिए. मुख्य वक्ता के रूप में अशोक वाजपेयी जी का नाम भी था किंतु किसी कारणवश वे नहीं आ सके. कार्यक्रम का सफल एवं कुशल संचालन रवीन्द्र त्रिपाठी जी ने किया. समारोह स्थल पर कितने लोग आए इसका अंदाज़ा आनंद कुमार शुक्ल के इस वक्तव्य से लगता है: “उपलब्ध कुर्सियों से अधिक मेहमानों के आ जाने के कारण कुछ सम्मानित आगंतुकों को बैठने में परेशानी हुई. इस कारण थोड़ी गहमा-गहमी रही. फिर भी, कार्यक्रम अत्यंत सुरुचिपूर्ण और विद्वत माहौल में संपन्न हुआ.”
डॉ. कर्ण सिंह जी द्वारा पुस्तक के लोकार्पण के बाद लेखकीय वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने जब हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' लिखने का मन बनाया तभी से उनके जेहन में यह बात थी कि हिंदी में आम तौर पर लिखे जाने वाले यात्रा संस्मरणों की पद्धति का वे पालन नहीं करेंगे. एक ऐसी पद्धति जिसमें यह सूचना दी जाती है कि फला दिन को यात्रा का कार्यक्रम बना, फला दिन मैं दूतावास में गया और कितनी दिक्कतों के बाद मुझे वीजा की प्राप्ति हुई, फिर मैंने टिकट लिया और फिर मैं वहाँ गया आदि-आदि, असल में यात्रा वृत्तांत के नाम पर कुछ भी लिख देने भर की चाहत का नाम है. एक अच्छा यात्रा वृत्तांत वह है जिसमें यात्री उस जगह की साँस्कृतिक, सामाजिक और साहित्यिक सक्रियता, चेतना और संपन्नता को न केवल वर्तमान संबंध में बल्कि दूर अतीत के परिप्रेक्ष्य में भी देखे, अनुभव करे और उसका विस्तार से वर्णन करे साथ ही अपने देश के साँस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आदि संदर्भों से उसकी भिन्नता-अभिन्नता का भी बहुत निर्मम तरीके से अन्वेषण करे. उन्होंने अस्त्राखान से अपने संबंधों के बारे में बोलते हुए कहा कि बहुत पहले शायद बचपन में मैंने अस्त्राखान के बारे में पंडित नेहरु को पढ़ा था जिसमें अस्त्राखान और वहाँ के हिंदू व्यापारियों और हिंदी सराय का वर्णन था पर बात कहीं विस्मृत हो चुकी थी. सितंबर 2011 में मुझे एक सेमिनार में येरेवान जाने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने सोचा कि क्यों न इस अवसर का सदुपयोग करते हुए अस्त्राखान की यात्रा भी की जाए. और इस सोच को अमली जामा पहनाते हुए मैंने ऑफिस से तीन दिन की छुट्टी ली और अस्त्राखान वाया येरेवान जा पहुँचा. उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक कई मूलभूत चिंताओं का प्रतिफल है. सात दिन की अपनी अस्त्राखान और येरेवान की यात्रा के दौरान कई मिथ टूटे, बहुत सी नयी बातें ज्ञात हुईं, बहुत सारे अंधविश्वास समाप्त हुए और इन सबने मिलकर इस पुस्तक का रूप ग्रहण किया. उन्होंने अस्त्राखान के हिंदू व्यापारियों का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहाँ के व्यापारी मूलतः हिंदू थे जो मारवाड़, पंजाब व गुजरात से वहाँ पहुँचे थे. एक और महत्वपूर्ण बात जो प्रोफेसर अग्रवाल ने कही कि भारत को जड़ समाज बताना ही प्रगतिशीलता का पर्याय हो गया है और भारतीय समुद्र पार की यात्रा को पाप मानते थे. इस अवधारणा को सिरे से खारिज करते हुए इसे औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि से प्रेरित बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय दूर देशों की यात्रा करते थे, इसके स्‍पष्‍ट प्रमाण हैं.


प्रोफेसर अग्रवाल ने अपने संबोधन में कवि चारेंत्स (जिनका वर्णन पुस्तक में भी है) का ख़ास तौर पर ज़िक्र करते हुए एक बहुत मार्के की बात कही कि अस्त्राखान और येरेवान में कई सड़को के नाम वहाँ के प्रमुख साहित्यकारों के नाम पर हैं जबकि भारत की राजधानी दिल्ली में मुंशी प्रेमचंद के नाम पर कोई सड़क नहीं है. कवि चेरेंत्स की कुछ रचनाओं का हिंदी अनुवाद पेश करते हुए प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने अपनी लोकार्पित पुस्तक के कुछ अंश भी पढ़ कर सुनाये. उनमें वह अंश भी शामिल था जिसमें लौटते समय की हवाई यात्रा के दौरान बिजनेस क्लास में और वह भी अकेला मुसाफिर होने की घबराहट, एयर होस्टेस से घबराते हुए वाइन माँगना और वाइन सर्व करते हुए दुर्घटनावश एयर होस्टेस के सर पर लगी चोट और एक मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत प्रोफेसर अग्रवाल के हाथों का उसके सर को सहलाना...इस प्रसंग के पाठ ने जहाँ सभा में हास्य का पुट घोला, वहीं सबको प्रोफ़ेसर अग्रवाल के मानवीय रूप के अलावा उस रूप का भी पता चला जिसका परिचय उनके फेसबुक मित्रों को पिछले कुछ वर्षों से धीरे-धीरे हो रहा है...उनका कवि रूप. गद्य में सुंदर पद्य की भाषा कैसे लिखी जा सकती है, इसका शानदार नमूना है वह अंश. बाद में विद्वान वक्ताओं ने पुरुषोत्तम जी के इस प्रसंग का मज़ा भी लिया और उनके मानवीय रूप और पद्यात्मक गद्य भाषा की जमकर तारीफ़ भी की.

प्रोफेसर अग्रवाल के बाद पहले वक्ता के रूप में जे.एन.यू. में रशियन स्टडीज की प्रोफ़ेसर सुश्री मन्नू मित्तल जी ने हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' के लोकार्पण पर प्रोफेसर अग्रवाल को बधाई देते हुए येरेवान की अपनी यात्रा को याद किया और कहा कि विश्व पटल पर भारतीयों की भूमिका प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रही है. मध्य एशिया के देशों के साथ भारत का वैचारिक और साँस्कृतिक आदान-प्रदान कई शताब्दियों से रहा है. सदियों पुराने बने मंदिरों और ऐतिहासिक स्थलों को बनाने में भारतीय कारीगरों का बहुत बड़ा योगदान रहा है पर पाश्चात्य जगत ने अपने इतिहास में इस योगदान को जगह न देकर, इस पर एक पर्दा गिरा रखा है. उन्होंने आगे कहा कि सिल्क रूट केवल ईस्ट-वेस्ट नहीं था बल्कि एक साउथ-नार्थ सिल्क रूट भी था और इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है. सुश्री मित्तल ने कहा कि जे.एन.यू. के वाइस चांसलर ने एक ‘सिल्क रूट स्टडी सेंटर’ बनाए जाने का समर्थन किया है और जब भी यह स्टडी सेंटर कायम होता है और जब भी एक ‘सिल्क रूट लाइब्रेरी’ बनेगी, पुरुषोत्तम अग्रवाल की और उनकी इस पुस्तक की वहाँ अत्यंत आवश्यकता होगी. साथ ही हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान'  में किये गए तमाम तरह के अन्वेषणों खासकर भाषा संबंधी अन्वेषणों का भी उन्होंने वर्णन किया.

दूसरे वक्ता के रूप में जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की इस बात से सहमति जताते हुए कि यात्रा संस्मरण केवल कुछ जानकारियों को साझा करने का नाम भर नहीं है, कहा कि एक यात्रा संस्मरण वास्तव में एक समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, साँस्कृतिक, वैचारिक अन्वेषण करने वाला वह इतिहास होता है जिसे एक साहित्यकार ही लिख सकता है और उन्हें खुशी है कि उपरोक्त सभी पहलुओं से लैस यह यात्रा संस्मरण प्रोफेसर अग्रवाल जैसे साहित्यकार ने लिखा है. प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने अपने संबोधन में ओम थानवी जी के पुस्तक अंश पढ़ने के उद्देश्य पर यह कहकर रोक लगाई थी कि यह काम उनका है पर ओम थानवी जी ने कहा कि पुस्तक अंश पढ़ना उनकी ज़िद है और अपने ज़िद पर कायम रहते हुए उन्होंने पुस्तक के कुछ अंशों का पाठ किया और पुस्तक के समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, साँस्कृतिक, वैचारिक पक्षों को श्रोताओं के सामने रखा. उन्होंने बताया कि किस तरह से यह संस्मरण भाषा के प्रति लेखक की चिंता और फिर उसके अन्वेषण को दिखाता है. श्री थानवी ने कहा कि जब एक लेखक अपनी पुस्तक में किसी बात का ज़िक्र करता है तो वह पाठकों को और बहुत से लेखकों और घटनाओं की याद दिलाता है. प्रोफ़ेसर अग्रवाल की पुस्तक में अस्त्राखान और येरेवान के नगरों और महलों के निर्माण में लगे मजदूरों में से किसी का कहीं उल्लेख न होने के दुखद वर्णन को याद करते हुए ओम थानवी जी ने कहा कि उन्हें यह अंश पढ़ते हुए अज्ञेय की एक कविता याद आ गई.

जो पुल बनाएंगे
अवश्य ही पीछे रह जाएंगे
सेनाएं हो जाएंगी पार
जयी होंगे राम
मारे जाएंगे रावण
जो निर्माता रहे
इतिहास में बंदर कहलाएंगे. (अज्ञेय)

उन्होंने पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा गाँधी जी का ससम्मान अपनी पुस्तक में उल्लेख करने पर बधाई देते हुए कहा कि यह दिखाता है कि बहुत सारे प्रगतिशीलों की तरह प्रोफेसर अग्रवाल प्रगतिशीलता का अंध अनुसरण नहीं करते हैं, अपितु उपलब्ध साक्ष्यों और अपने विवेक के आधार पर अतीत का पुनर्मूल्यांकन करते हैं. अंत में उन्होंने एक बहुत ही मार्के की बात कही कि “हिंदी सराय की यात्रा सरस गद्य में अतीत का साँस्कृतिक संधान है.”

सांसद व लेखक देवीप्रसाद त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत यह कहते हुए की कि उन्हें जो जो कहना था वह उनके पूर्व के वक्ताओं ने कह दिया है. किंतु इस वाक्य के बाद इस यात्रा संस्मरण के बारे में कई स्थापनाएँ देते हुए अपने सम्मोहित कर देने वाले अंदाज़ में श्री त्रिपाठी ने श्री अग्रवाल के इस काम की भूरी-भूरी प्रशंसा की. उन्होंने पुस्तक की भाषा का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि यह पुस्तक प्रवाहमान गद्य में लिखी गयी है. उन्होंने प्रोफ़ेसर अग्रवाल की सहज-सरल और प्रवाहमय भाषा की तारीफ़ करते हुए पुस्तक के कई वाक्यों को उद्धरित भी किया. उन्होंने कहा कि यह केवल एक यात्रा संस्मरण भर नहीं है अपितु इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र, व अर्थशास्त्र का संगुफन है. सात अध्यायों में लिखी गई यह पुस्तक देखने में छोटी ज़रूर है पर अपनी पहचान में बड़ी है. हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' को उन्होंने समाजशास्त्रीय समझ के साथ लिखा गया ऐतिहासिक लेखन बताते हुए उसे न केवल यात्रा संस्मरण की विधा की, न केवल हिंदी साहित्य की अपितु पूरे साहित्य की एक अति महत्वपूर्ण कृति करार दिया. अंत में उन्होंने हास्य की मुद्रा में  कहा कि वे महत्वपूर्ण साहित्य उसे मानते हैं जो गद्य, पद्य और मद्य तीनों में लिखी जाए और प्रोफेसर अग्रवाल की पुस्तक इन तीनों को अपने अंदर समेटती है. यह कहते हुए उन्होंने हिन्दी सराय...’ के गद्य, उसमें सम्मिलित कवि चेरेंत्स की कविताओं के साथ अन्य कविताओं का ज़िक्र और वापसी की यात्रा में एयर होस्टेस से वाइन माँगने की घटना की ओर इशारा किया.
    
और अंत में डॉ. कर्ण सिंह ने अपने संक्षिप्त संबोधन में पूरी ईमानदारी से और अफ़सोस करते हुए यह स्वीकार किया कि संसद की व्यस्तता के कारण वे पुस्तक को पढ़ नहीं सके पर जैसा कि अन्य वक्ताओं ने इस पुस्तक के बारे में कहा उससे उनकी जिज्ञासा चरम पर पहुँच गयी है और वे जल्द ही इस पुस्तक का अध्ययन करेंगे. यात्रा संस्मरणों की बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें यात्राएँ बहुत पसंद हैं और उनके बारे में पढ़ना भी. उन्होंने इस पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि प्राचीन भारत कोई जड़बद्ध समाज नहीं था जैसा कि आमतौर पर मान लिया जाता है. भारत की प्राचीन संस्कृति और वैचारिक संपन्नता का विश्व के कई देश न केवल आदर करते थे बल्कि उसका लोहा भी मानते थे. कम्बोडिया, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि कई मध्य एशिया के देशों के मंदिर और वास्तु कला आज भी भारत की विकसित साँस्कृतिक और वैचारिक संपन्नता को दर्शाते हैं. यद्यपि ब्रिटिश शासन के औनिवेशवादी मानिसकता ने इस संपन्नता को काफ़ी नुकसान पहुँचाया और यह एक प्रकार से दब सा गया पर आज इसे फिर से लोगों के सामने लाने की आवश्यकता है और पुरुषोत्तम अग्रवाल की यह पुस्तक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है.


उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न स्थानों और देशों की यात्रा से बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है. नए-नए लोगों से होने वाली मुलाकातें, नई-नई संस्कृतियों से रूबरू होना और यात्रा में आने वाली कठिन परिस्थितियाँ व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं. पुस्तक में एक स्पष्ट नक्शा न होने की कमी की तरफ़ इशारा करते हुए अंत में डॉ. कर्ण सिंह ने हिन्दी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान' में सम्मिलित किये गए चित्रों और विभिन्न विषयों की प्रशंसा करते हुए ज़ोर देकर कहा कि इस महत्वपूर्ण पुस्तक का यथाशीघ्र अग्रेज़ी में अनुवाद होना चाहिय.    
    

पूरा लोकार्पण समारोह कैसा था इसकी एक बानगी समारोह में शामिल कवियित्री रूपा सिंह के फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी से मिलती है. उन्होंने (रोमन लिपि) में लिखा है:

“जैसे यात्रा के विविध पड़ाव होते हैं....पूरी मजलिस...कई दौर से गुज़रती रही...पॉलिटिक्स, हिस्ट्री, कल्चर, फ़ूड,...गद्य..पद्य...की गंभीरता के साथ....संजोयी..मीठी रसीली यादों की चुटकियाँ....एक रंग-रास-वैविध्य भरी यात्रा.....अरे यायावर रहेगा याद....”







सईद अय्यूब  

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समालोचन की दूसरी वर्षगाँठ

11/15/2012


"12 नवंबर, 2012

बधाई समालोचन..


यह उन दिनों की बात है जब मैंने समालोचन पढ़ना शुरू किया था.समालोचन और सबद मेरी प्रिय पत्रिकाएँ थीं.फिर मेरा परिचय पत्रिका जानकी पुल से हुआ. प्रतिलिपि को जाना. एक के बाद एक कई अच्छे blog खुलते गए. शिरीष मौर्य का अनुनाद,असुविधा,गीत का अपना ब्लॉग, बुद्धू बक्सा ..

समालोचन पढ़कर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि इसके पेज में किताबों की ख़ुशबू नहीं है या पन्ने पलटने की सुपरिचित आवाज़ की कमी है,जो निगाहों के स्पर्श से स्पंदित होती है या भीगती है. समकालीन कविता, कहानी और आलोचना को मैंने इसी झरोखे से देखना शुरू किया.

करीब दो साल पुरानी बात है. मैंने अपनी कविताएँ सबद के लिए भेजीं.मुझे तब कविता का भी पता नहीं था. बाद में जब समालोचन पर लगातार कई पोस्ट पढ़ीं और मुख्य धारा को पहचानने बूझने की समझ पैदा हुई तो अपने उस बचपने पर हंसी आई और खीज भी. शायद संपादक भी हँसे होंगे.

मैं हर तीसरे दिन अरुण की वॉल पर जाती और देखती कि आज क्या पोस्ट है ..धीरज से उसे पढ़ती और मन ही मन संपादक की इज्जत करती. अरुण को व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं जानती थी तब. आदतन एक दिन जब मैं अरुण की वॉल पर गई तो वहां नयी पोस्ट नहीं थी. थोड़ी बेचैनी महसूस हुई. अगले दिन का इंतजार किया ..उस दिन भी वही पुरानी पोस्ट ..उसके अगले दिन भी.रहा नहीं गया तो संपादक को सन्देश डाला कि पोस्ट अभी तक बदली नहीं है और मैं समालोचन की नियमित पाठक हूँ. अरुण से यह मेरा पहला परिचय था
समालोचन को लेकर मैं बहुत possessive होती चली गई. ठीक उस तरह जैसे बचपन में और युवा होने तक घर में आने वाली पुस्तक, पत्रिका को मैं सबसे पहले हड़पने की फिराक में रहती थी. बड़े भाई से कई बार मार भी पड़ जाया करती थी. अपनी उम्र के सैतालीसवें पड़ाव पर एक बार फिर मैं वहीँ लौट आई हूँ ....हाँ, यहाँ बड़े भाई पीटने को नहीं खड़े हैं.

समालोचन से मैंने बहुत कुछ सीखा ..पढ़ने का धीरज पाया.पुरानी आदत थी ..वह छूट गई.अकसर एक साथ कई किताबें शुरू करने की. एक साथ कई किताबें खरीदने की. इस चक्कर में कई किताबें 20 पृष्ठ से आगे पढ़ी ही नहीं गईं. उनमें आज तक bookmark लगा हुआ है.कोर्स भी मैं ऐसे ही पूरा किया करती थी.पर इधर एक साल में बदलाव आया है.बूढ़े तोते ने अपनी उतावली पर रोक लगाई है.

लेखन का सलीका,उसकी अपनी एक विशिष्ट बुनावट,उसकी ध्वनियाँ सामान्य से अलग होती हैं ..उसकी केमिस्ट्री और शब्दों की एल्केमी मैं यहाँ से, समालोचन से सीख रही थी. ..दिन की शुरुआत यहीं से होती है और फिर शाम तक कोई अधूरी छूटी पुस्तक चल रही होती है ..आने वाले दस वर्षों तक चश्मा नहीं चढ़ेगा ..इस बात का अहंकार तो कर सकती हूँ और इस बात का अभिमान कि अपनी भाषा के सशक्त हस्ताक्षरों को काफी करीब से देख रही हूँ ..उन लेखकों, आलोचकों को पढ़ पा रही हूँ जो अहमदाबाद के इस अलग-थलग कोने में दिखाई-सुनाई नहीं पड़ते. हिंदी की पत्रिकाएँ भी यहाँ दिखाई नहीं देतीं. जिन पत्रिकाओं को मंगवाने की जुगत लगाई ..पैसा भी खर्च किया वह डाक विभाग मुझ तक नहीं पहुंचा पा रहा है.हिंदी का यह पाठक आज नेट के माध्यम से कम से कम 23 साल पहले छूटी भाषा से जुड़ पा रहा है.पढना भी एक लत होती है.लिखना भी एक लत ही है.कहीं भी कुछ भी मिल गया पढ़ लिया या लिख लिया;पर अच्छी पत्रिकाएँ आपको एलीमिनेशन सिखाती हैं. क्या पढना है?कितना पढना है?क्यों पढना है? इनकी अंदरूनी व्यवस्था आपको अनुशासित करती है.नेट की पत्रिकाओं को मैं कम नहीं आंकती.कम से कम इनमें पेपर की बचत है.आसानी से आपको मिल रही हैं.नियमित रूप से आप पढ़ रहे हैं.बहुत सारा नहीं ..

समालोचन को मैं इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की कलात्मक साहित्यिक पत्रिका कहूँगी जिसका जीवन से सीधा सरोकार है.कभी कोई चित्र किसी कहानी या कविता में set induction की तरह आता है कि बहुत देर तक आप(यानी पाठक) इस चित्र पर ठहरते हैं और फिर कृति तक आते-आते शब्द सफ़रनामा बन जाते हैं. प्रत्यक्षा की कहानियों में चित्रों के संयोजन ने गहरी छाप छोड़ी.चित्र केवल बच्चों को ही प्रभावित करते हैं क्या? फिर यहाँ आये इन चित्रों का अपना अर्थ है.चित्र यहाँ एक ख़ास चित्रकार को एक ख़ास लेखक के साथ जोड़ रहे हैं.एक ख़ास तस्वीर आपको ख़ास माहौल में ले जा रही है.

मैं शुक्रगुज़ार हूँ उन सभी हिंदी नेट पत्रिकाओं की जिनके माध्यम से मैं फिर से जीवन और साहित्य से जुडी.अपने एकांत में मैंने नीलेश को खूब पढ़ा.अनामिका पर मैं लट्टू हुई.अनीता वर्मा को धीरे-धीरे आत्मसात किया.सविता सिंह को दोहराया.प्रत्यक्षा ने मुझे विस्मय दिया और अभी तक कृष्णा सोबती की शाहनी के दर्द में डूबे एक किरदार (शाहनी का किरदार अकसर मैं खुद में पाती हूँ.)को अल मस्ती सिखाई मनीषा ने. सुमन जी के मिथकों में मैं आज की नयी औरत को देखती रही.

मैं जानती हूँ 'समालोचन' आप अरुण की संतान सदृश हैं , जिसके लिए अरुण ने अपने लेखन का समय तुम्हें दिया है. अरुण के भीतर का कवि कभी म्लान होता नहीं दीखता, शायद इसका कारण तुम्हारे प्रति अरुण का अगाध प्रेम हो ..उन लेखकों के प्रति अरुण का प्रेम हो या पाठकों के प्रति गहरा लगाव, या इससे भी आगे साहित्य के लिए निस्पृह भाव से समर्पण जो उन्हें ऊर्जावान बनाता रहा है.

समालोचन तुम्हारे प्रति मेरी अपनी भी प्रतिबद्धताएं हैं, बतौर पाठक .


तुम्हारे जन्मदिन पर अशेष शुभकामनाएँ बधाई ..

बहुत सारी उम्मीदों के साथ

यह वैयक्तिक ब्लॉग न हो कर समूची पत्रिका है- आप की अंतर्दृष्टि और संलग्नता का जिंदा कारतूस !


समालोचन अकेलेपन का साथी रहा.जब कोई नहीं था तब वह था. कभी कब्बानी बनकर घर आया ..देश वीराने में मेघ-दूत की तरह .. उदासी में राग-रंग की तरह..गगन-गुफा से आती कथा -गाथाएँ ..निज घर में रीझि कर एक कहा प्रसंग की तरह होती ..समालोचन को स्नेह


अपर्णा की वजह से समालोचन का पता चला.आप बेहतरीन सामग्री प्रकाशित करते हैं.वेब पत्रिका की सीमायें तो बहुत हैं.यहाँ पाठक वैसे भी गंभीर कम हैं और साहित्य से जुड़े लोग खेमेबाजी के शिकार हैं.कल कहीं पढ़ा था फेसबुक वह स्थान है जहाँ रिश्तेदार आपको डिलीट करते हैं और दुश्मन आपकी हलचलों पर नजर रखते हैं.अजीब समीकरण है.मगर आपका प्रयास सराहनीय है.बधाई और उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनायें.


 इंटरनेट पर हिंदी में कुछ ही ब्लॉग ऐसे हैं जो महत्वपूर्ण ई-पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं. जाहिर है कि समालोचन उनमें विशिष्ट है. समालोचन की यह कामयाबी दरअसल अरुणदेव के संपादकीय विवेक और परिश्रम का फल है. अरुणदेव और समालोचन के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएँ. अपर्णा जी को भी समालोचन से अपने खास जुड़ाव के लिए इस अवसर पर बहुत बधाई.



यह बिला शक एक बेहद ज़रूरी वेब साहित्यिक पत्रिका है. अपने जीवन के दो वर्ष पूरे कर लेने पर ढेर सारी बधाई, और भविष्य के लिए शुभकामनाएं...शुभकामनाएं...शुभकामनाएं.


बहुत अच्छा काम किया है समालोचन ने, असल में यह प्रतिमान है, बेव पर साहित्यिक पत्रकारिता का...बधाई बल्कि धन्यवाद अरुण....

जैसा पुरुषोत्तम सर ने कहा - "बहुत अच्छा काम किया है समालोचन ने, असल में यह प्रतिमान है, बेव पर साहित्यिक पत्रकारिता का...बधाई बल्कि धन्यवाद अरुण...." तो शुक्रिया अरुण


अपर्णा जी ने बहुत लगाव से लिखा है. और इस बात में कोई शक नहीं कि समालोचन सबसे प्रतिष्ठित ब्लोग्स में से एक है. अरुण सर जितने मेहनत और प्यार से इसे सजाते हैं और इसका स्तर बरकरार रखते हैं वह काबिलेतारीफ है. बहुत बधाईयाँ


आपको और समालोचन की पूरी टीम को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं.



mitr shukriya....abhi uthha hu. kuch der baad aataa hu....man bhavuk h....so ise control kr likhoonga ....



अरुण भाई आपको व समालोचन की सम्पूर्ण टीम को मेरी ओर से आभार , नेट पर आप साहित्य के क्षेत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक काम करने में सलग्न हैं ......कला के रचनाकर्म को बहुत ही गंभीर रूप से आप हम सब लोगों के सामने रख रहे है .....मेरी यह कामना है आपका यह सुन्दर प्रयास अथक रूप में आगे भी अपने सर्वोतम रूप में जारी रहे.
अपर्णा जी को बधाई ... उन्होंने नेट पर छपने वाले साहित्य की महता को भावुकता भरे शब्दों में हमसे साझा किया ....



समालोचन ने ब्लॉगों की दुनिया को बेहतर और विश्वसनीय पहचान दी है ...जिन कुछ ब्लॉगों के आधार पर हम नेट की दुनिया को सराहते हैं , उनमे समालोचन प्रमुख है ...बिना किसी अनावश्यक विवाद के और उत्तम सामग्री के आधार पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले इस ब्लाग पर हम सबको गर्व है ...बधाई समालोचन को इस दो साल के स्वर्णिम सफ़र के लिए ...यह सफ़र जारी रहे , इस कामना के साथ ...



में पिछले कुछ महीनों से जितना भी थोडा बहुत समालोचन को पढ़ पायी हूँ मैंने इसे अपर्णा जी और अरुण जी का साझा प्रयास ही माना है ....नहीं मालूम था की अपर्णा जी इससे बतौर पाठक ही जुडी थीं. फिर भी हम नए पाठकों के लिए समालोचन का मतलब अरुण जी और अपर्णा जी ही रहेंगे...पाठक भी कैसे किसी पत्रिका का अपरिहार्य अंग हो जाते हैं ये अपर्णा जी के पत्र से जाना मैंने...समालोचन को ऐसे ही पाठक और सहयात्री मिलते रहें और सफ़र चलता रहे इसी शुभकामना के साथ.


'समालोचन' के लिए आपके श्रम और समर्पण की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम ही होगी. ढेर सारी शुभकामनाएं!!


प्रीति समालोचन एक ट्रायंगल है(अच्छी पत्रिकाएँ ट्रायंगल होती हैं). एक सिरे पर संपादक अरुण हैं और बाकी दो छोर पर लेखक और पाठक ..इसलिए जब भी समालोचन का नाम लिया जाएगा वहां संपादक -लेखक- पाठक होगा ..तीनों की ऊर्जा सतत प्रवाहित है.ट्रांसमिट होती हुई..(व्यक्तिरूप में "अपर्णा" नाम का समालोचन में कोई अस्तित्व नहीं.)
अरुण को संपादक से अलग कवि रूप में देखती हूँ तो आदर का भाव पैदा होता है और सामान्य मानव होने के रूप में अरुण में बची हुई मानवता देखती हूँ तो आश्वस्ति होती है.यह गुणगान नहीं ..निर्लिप्त रूप से उसके प्रति स्नेह का भाव है(आस्था नहीं कहूँगी,क्योंकि वह विवेक का नाश करती है.).ऐसा ही स्नेह अरुण को अपने सभी मित्रों से मिला है.

पता नही क्यो आप् के लिये प्रिय कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्ति याद आ रही है...सो आप को समर्पित है...अब मै किसी सूरज को नहीं डूबने दूगा.....आप लोगों से मिलना मेरे जीवन का बहुत प्रिय रहा. समालोचन की एक बात मुझे बहुत पसन्द है...विवादो से दूर रहना ...ओर सहिश्नु ...रहना. आज भी मै अपने पढ़ ने के पुराने तरीके पर ही यकीन करता हू. लम्बे समय तक रचना के साथ रहना .उस के एकांत...ओर उजाड मे भट्कना..जहा कोइ तत्कालिक्ता न हो..
आप ने बहुत सह्रिदयता से मेरी भी कविताये ली. मै आप का शुक्र्गुजार हू. मै बहुत संशयी हू... मेरा सनातन अवसाद और सनक मुझे किसी भी जगह ज्यादा देर नही रह् ने देते. अक्सर फेसबुक से जाने की सोचता हू..आप जैसे सदाशयी मित्रो को इस तरह काम करता देख मन भावुक हो जाता है.
 

पहले मुझे कोई नहीं जानता था .. फिर मैंने मेरी कविताओं की ओर समालोचन सम्पादक का ध्यान आगाह कराया .. कवियों के मुख्य कोलम 'सहजि सहजि गुण रमे ' की गुणवत्ता के हिसाब से तो मैं असफल रहा पर सब्सिडियरी कवियों के कोलम 'मंगलाचार' में मुझे जगह मिली .. फिर मैं भी कवि हो गया .. कुछ लोग जानने लगे मुझे ... बहुत बड़ा दिल है समालोचन सम्पादक का .. बधाई समालोचन :-)




समालोचन में प्रकाशित होना सचमुच सुखकर है अरुण जी.


 बधाई हो. और भी उन्नति हो...शुभकामनाएं

बधाई और शुभकामनाएं ...इसकी प्रतिष्ठा और बढ़े .


मैं फेसबुक पर आई थी समय काटने के हिसाब से....फिर यहाँ आकर कुछ मेरे रुझान के चलते साहित्य जगत के लोगों से मित्रता हुई...और फिर इन्ही के म्यूचुअल दोस्त होने की वजह से Arun Dev जी से जुड़ना हुआ...मैं भी समालोचन की नियमित पाठिका बन गयी...यहाँ प्रकाशित हुए लेखों , कविताओं और उन पर हुई टिप्पणियों के माध्यम से साहित्य जगत के बारे मे बहुत कुछ जानने को मिला....समालोचन मे प्रकाशित सभी प्रकार की सामग्री बहुत ही उच्च स्तर की होती है....समालोचन की वजह से ही बहुत से गुणी जनों को पढ़ना आसान हो गया....आपको बहुत बहुत धन्यवाद अरुण जी और समालोचन के जन्मदिवस पर बहुत बहुत शुभकामनायें....खूब तरक्की करे समालोचन यही मेरी हार्दिक तमन्ना....:)...आमीन....Happy birthday to Samalochan in advance...


समालोचन ने मुझे स्वयं से परिचित कराया......आभार और ढेर सारी शुभकामनायें



'समालोचन' के दूसरे वर्षगाँठ पर ज़ोरदार अभिनन्दन और ....जोहार ! .साथ में दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं ...!

हिंदी की नेट साहित्यिक पत्रकारिता में 'समालोचन' अलग दिखाई देता है. और यह दर्जा उसने बड़े परिश्रम और अपने कमिटमेंट से हासिल किया है. बधाई.


"समालोचन" को उसकी दूसरी वर्षगाँठ पर हार्दिक शुभकामनाएँ... एवं अरुण जी को बधाई ,समालोचन को स्तरीय बनाए रखने के लिए.... :)


समालोचन के दो वर्ष पूरे होने पर हमारी हार्दिक बधाई और इस समर्पित साहित्यिक ई पत्रिका की भावी सफलताओं के लिए सत्-सत् शुभकामनाएं. भाई अरूण देव जी के श्रम का साक्षी है सामालोचन.


समालोचन हिंदी की इ -पत्रिका का सिरमौर है ...........और यह उपलब्धि उसने तुक्के में नहीं पा ली है .........इसके पीछे संपादक का घनघोर परिश्रम और कमिटमेंट है और साथी लेखकों की जीवंतता भी है ......समालोचन और दमके और चमके .............इस दीवाली कामना है यही ...........भाई अरुण देव बहुत बधाई और आपके श्रम को सलाम ....................


Big Congratulations to Samalochan!!!


I would say Samalochan is a "flower-vase" decorated with well selected beautiful flowers from the literary gardens. I have come to know about many good Hindi writers and their published works only through Samalochan.

Thanks to the Samalochan TEAM for working hard preserving and promoting Hindi Literature and giving well deserved esteem to the writers and their works.


Best Wishes for the days ahead!



आज धनतेरस के दिन यही कहूँगा कि 'समालोचन' निरन्तर जिस प्रकार से साहित्यिक धन की वर्षा कर रही है, वह आगे भी करती रहे. अरुण जी! आपको ढेरों बधाइयाँ!


samalochan ke mujhe samradh kiya kee nayee jankariyan milli aur aasha hai aage bhee yahi dour chalta rahega janamdin mubrak



नेट पर आ रहे साहित्य को अगंभीरता से लेनेवालों के लिए समालोचन एक उदाहरण है ...


Tarun Bhatnagar बधाई...
  
मंगलकामनाएँ एवम दिली बधाई अरुण भाई


अभी फिलहाल अनंत बधाइयाँ व अनंत शुभकामनाएँ! समालोचन दिन-चौगुनी, रात-सतगुनी तरक्की करता रहे. संपादक अरुण देव जी को अनंत बधाइयाँ व शुभकामनाएँ! जल्द ही अपने अनुभव लिखूँगा, समालोचन को लेकर. अपर्णा जी का खत पढ़ना अच्छा लगा. दिवाली की भी आप सबको हार्दिक बधाई!
  
Samalochan.blogspot.com has made history. Visiting it has become a second habit of us who are concerned to address the issues that the present world confronts. For our Hindi fraternity it provides a world class forum to debate and discuss. It makes us interactive, participative while giving a connect to world literature. So hats off to this glocal phenomenon that the ARUN & Co has created.


एक जरूरी साहित्यिक पत्रिका है समालोचना . क्या संभव है की इसकी रचनाओं को प्रिंट में भी लाया जाय .. अनियतकालीन !




 
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